रामपुर रज़ा पुस्तकालय एवं संग्रहालय को विश्वस्तरीय संस्थान के रूप में विकसित करने की तैयारी

रामपुर: रामपुर रज़ा पुस्तकालय एवं संग्रहालय के निदेशक डॉ. पुष्कर मिश्र ने एक प्रेस वार्ता के दौरान पत्रकारों का अभिनंदन किया और पुस्तकालय के ऐतिहासिक महत्व व भविष्य की योजनाओं पर चर्चा की।

उन्होंने बताया कि रामपुर रियासत की स्थापना 1774 में हुई थी और नवाबों ने यहां के तोशाखाने में पुस्तकों का संग्रह करना शुरू किया। यह संग्रह पीढ़ी दर पीढ़ी विस्तारित होता गया। वर्ष 1905 में हामिद मंजिल का निर्माण हुआ, जिसमें चारों ओर आठ मीनारें हैं। इन मीनारों में मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च और मंदिर के प्रतीक बने हैं, जो दर्शाते हैं कि रामपुर के नवाब सभी उपासना पद्धतियों को समान दृष्टि से देखते थे।

रामपुर रज़ा लाइब्रेरी – दुर्लभ ग्रंथों और बहुसंस्कृति की धरोहर
डॉ. मिश्र ने बताया कि रामपुर रज़ा लाइब्रेरी में 20 से अधिक भाषाओं में पांडुलिपियां और पुस्तकें संग्रहीत हैं। इनमें तमिल, तेलुगु, मलयालम के ताड़पत्र, पश्तो, तुर्की, फारसी, अरबी, संस्कृत और हिंदी की दुर्लभ पांडुलिपियां शामिल हैं। नवाबों की यह संकल्पना बहुभाषीय और बहुसांस्कृतिक थी, जो आज भी अपने महत्व को बनाए हुए है।

रामपुर रियासत का विलय 1949 में भारत संघ में हुआ और 1957 में रज़ा लाइब्रेरी को एक ट्रस्ट के रूप में स्थापित किया गया। वर्ष 1975 में संसद के एक अधिनियम के तहत इसका प्रशासन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय को सौंपा गया।

रामपुर किले की भूमि पुस्तकालय को हस्तांतरित होगी
डॉ. मिश्र ने प्रेस वार्ता में एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए बताया कि रामपुर किले की संपूर्ण भूमि राज्य सरकार से स्थानांतरित होकर रामपुर रज़ा पुस्तकालय को सौंपी जाएगी। इस भूमि पर एक विश्वस्तरीय अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान, बहुभाषीय अनुवाद केंद्र, पांडुलिपि संरक्षण केंद्र, सांस्कृतिक केंद्र, आधुनिक वाचनालय और संग्रहालय का निर्माण किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि 15 अक्टूबर को हुई राज्यपाल की अध्यक्षता वाली बैठक में इन योजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है, और जल्द ही इन्हें मूर्त रूप दिया जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रही रज़ा लाइब्रेरी
रामपुर रज़ा लाइब्रेरी की दुर्लभ पांडुलिपियों और कलाकृतियों को मंगोलिया, मोरक्को, सऊदी अरब, कतर, ब्रुनेई, मलेशिया और मॉरीशस सहित विभिन्न देशों में प्रदर्शित किया जा रहा है।

हाल ही में चंगेज खान राष्ट्रीय संग्रहालय, ऊलानबातर, मंगोलिया में “जामे-उत-तवारीख” की दुर्लभ पांडुलिपि की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया, जिसे भारत के दूतावास के सहयोग से आयोजित किया गया था।

रज़ा लाइब्रेरी की प्रशंसा में आनंद महिंद्रा और लंदन के इतिहासकार
लंदन के इतिहासकार सैम डेलरिम्पल ने अपनी भारत यात्रा के दौरान रज़ा लाइब्रेरी की तस्वीरें साझा करते हुए इसे “विश्व की सबसे सुंदर लाइब्रेरी” बताया था। इस पर महिंद्रा एंड महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने भी प्रतिक्रिया दी और लिखा कि उन्हें इस ऐतिहासिक लाइब्रेरी के बारे में पहले जानकारी न होने का दुख है और वे इसे देखना चाहते हैं।

डॉ. मिश्र ने आनंद महिंद्रा और लंदन के इतिहासकार को रामपुर आने का आमंत्रण दिया है ताकि वे इस ऐतिहासिक धरोहर को नजदीक से देख सकें।

रामपुर रज़ा पुस्तकालय के इन ऐतिहासिक फैसलों से यह स्पष्ट है कि आने वाले वर्षों में यह संस्थान भारत के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और ज्ञान-विज्ञान केंद्रों में से एक बनकर उभरेगा।

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